>राजधानी लखनऊ एक बार फिर इमाम हुसैन की शहादत की याद में गमगीन माहौल में डूबने को तैयार है। 26 जून को मोहर्रम का चांद देखा जाएगा, जिसके बाद इस्लामी नववर्ष 1447 हिजरी का आगाज़ होगा। शिया और सुन्नी चांद कमेटियां एक साथ चांद देखने के बाद 27 या 28 जून से मोहर्रम के पाक महीने की घोषणा करेंगी।
इमाम हुसैन की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है मोहर्रम
>मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, जिसे शहादत और सब्र का महीना माना जाता है। कर्बला के मैदान में पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी को याद करते हुए इस महीने में शोक जताया जाता है।
लखनऊ में निकलते हैं विश्वविख्यात जुलूस
>लखनऊ मोहर्रम की परंपरा और ताज़ियादारी के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। बड़ा इमामबाड़ा, हुसैनाबाद, रूमी गेट, नक्खास और चौक जैसे इलाकों से ऐतिहासिक ताज़िए और मातमी जुलूस निकाले जाते हैं। यह सिलसिला दस दिनों तक चलता है और 10वीं मोहर्रम यानी ‘आशूरा’ के दिन अपने शबाब पर होता है।
>शहर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन सतर्क है। लखनऊ पुलिस, शिया-सुन्नी धार्मिक संगठनों के साथ समन्वय बनाकर शांति और सौहार्द बनाए रखने की योजना पर काम कर रही है।
धार्मिक समरसता की मिसाल
>मोहर्रम सिर्फ एक मज़हबी पर्व नहीं, बल्कि यह लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब का भी प्रतीक है, जिसमें हिंदू समुदाय के लोग भी ताज़िए की सेवा में भाग लेते हैं और जुलूसों में सहयोग करते हैं।
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