नई दिल्ली। चुनावी प्रक्रिया में शिक्षकों की ड्यूटी को लेकर चल रहे विवाद के बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे चुनावी कार्यों में शिक्षकों की सेवाएं लेने का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय शिक्षकों पर असहनीय बोझ नहीं डाला जा सकता और बच्चों की शिक्षा किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने यह टिप्पणी शिक्षकों की एसआईआर ड्यूटी के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को चुनाव संबंधी कार्यों के लिए शिक्षकों की ड्यूटी लगाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षकों पर इतना अतिरिक्त कार्यभार न पड़े जिससे उनका मानसिक और शारीरिक तनाव असहनीय हो जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों के मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) के प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के सेंट मैरी स्कूल मामले में दिए गए फैसले के अनुरूप किसी भी शिक्षक को स्कूल समय के दौरान चुनावी कार्य में नहीं लगाया जा रहा है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि कोई शिक्षक पूरे दिन छह से आठ घंटे तक पढ़ाने के बाद चुनावी कार्य भी करता है, तो इससे उस पर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ सकता है। अदालत ने आयोग से अपेक्षा जताई कि वह स्कूल समय के बाद लगाई जाने वाली चुनाव ड्यूटी के दौरान भी शिक्षकों के तनाव और कार्यभार का विशेष ध्यान रखे।
निर्वाचन आयोग ने अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों को बेबुनियाद बताया। आयोग की ओर से कहा गया कि जनहित याचिका दायर होने के बाद लगभग दस हजार शिक्षकों को वापस उनके स्कूलों में भेजने के आदेश जारी कर दिए गए थे। आयोग ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप ही लागू की जा रही है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दावा किया गया कि कई शिक्षकों को उनकी चुनावी ड्यूटी को लेकर स्कूल प्राचार्यों और चुनाव अधिकारियों से अलग-अलग निर्देश मिल रहे हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
इस पर अदालत ने कहा कि यदि ऐसे आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं, तो उन्हें रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
खंडपीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने तैनात किए गए बूथ स्तर अधिकारियों (बीएलओ) और बीएलओ स्वयंसेवकों की संख्या का विवरण अदालत के समक्ष रखा है। यदि याचिकाकर्ता के पास इससे अलग कोई तथ्य हैं तो उन्हें शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी।
याचिकाकर्ता एवं अधिवक्ता राजेश कुमार गोगना और अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने जनहित याचिका दाखिल कर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के लिए शिक्षकों की सेवाएं लेने के निर्वाचन आयोग के निर्णय को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इससे शिक्षकों के मूल शैक्षणिक दायित्व प्रभावित हो रहे हैं। वहीं निर्वाचन आयोग का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए यह व्यवस्था कानून के अनुरूप है।
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