>उत्तर प्रदेश के सरकारी प्राथमिक स्कूलों के विलय को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में मामला गर्मा गया है। बच्चों की पढ़ाई के भविष्य पर असर डालने वाले इस बड़े नीतिगत फैसले को लेकर अब दो विशेष अपीलों पर बहस पूरी हो चुकी है और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।
>बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा 16 जून, 2025 को जारी आदेश के तहत, 50 से कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक स्कूलों को नजदीकी उच्च प्राथमिक या कंपोजिट स्कूलों में मर्ज करने का निर्देश दिया गया था। सरकार का दावा है कि यह निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए लिया गया है। वहीं, कई अभिभावक और शिक्षा से जुड़े संगठन इस फैसले को बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं।
>7 जुलाई को जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने इस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि नीति से जुड़े फैसले को तब तक चुनौती नहीं दी जा सकती जब तक वो असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण न हो।
>हालांकि, इस फैसले को चुनौती देते हुए अब दो विशेष अपीलें दाखिल की गईं हैं – एक 17 बच्चों के अभिभावकों की ओर से और दूसरी 5 बच्चों की ओर से। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने एक अपील पर सुनवाई पूरी कर ली है और दूसरी पर सुनवाई जारी है।
>अपीलकर्ताओं का कहना है कि स्कूलों का विलय RTE (मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम) का उल्लंघन है। छोटी उम्र के बच्चों को दूरस्थ स्कूलों में भेजना न केवल असुविधाजनक बल्कि असुरक्षित भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बच्चों के लिए निजी वाहन या वैन की सुविधा नहीं होती, वहां माता-पिता बच्चों को दूर स्कूल भेजने में संकोच करेंगे। इससे या तो बच्चे पढ़ाई छोड़ देंगे या फिर प्राइवेट स्कूलों में मजबूरी में दाखिला लेना पड़ेगा।
>उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ और प्राइमरी शिक्षक संघ ने भी इस निर्णय की आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे हजारों प्रधानाध्यापक और शिक्षक सरप्लस हो गए हैं और कार्यवाहक हेडमास्टरों को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा।
>सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCF-2020) के अनुसार स्कूलों के बीच संसाधनों के साझा उपयोग और गुणवत्ता युक्त शिक्षा को बढ़ावा देना जरूरी है। इसके तहत प्रत्येक जिले में मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट विद्यालय और मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल खोले जा रहे हैं।
>इन स्कूलों में स्मार्ट क्लास, सीसीटीवी, वाई-फाई, ओपन जिम, पुस्तकालय, डिजिटल लाइब्रेरी और विज्ञान लैब जैसी आधुनिक सुविधाएं होंगी। सरकार का दावा है कि इन प्रयासों से बच्चों को बेहतर वातावरण मिलेगा और शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक सुधार होगा।
>हालांकि सरकार की मंशा संसाधन और गुणवत्ता सुधारने की हो सकती है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे अलग है। जहां एक ओर सुविधाएं जुटाने का दावा है, वहीं दूसरी ओर स्कूल तक पहुँच, बच्चों की सुरक्षा और स्थानीय संरचनात्मक विषमताएं इस निर्णय की सफलता पर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं।
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