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अरविंद केजरीवाल की बड़ी फजीयत, जारी हुआ कोर्ट का आपराधिक अवमानना नोटिस

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की सख्त टिप्पणी - सोशल मीडिया के जरिए न्यायपालिका के खिलाफ चलाया गया समानांतर नैरेटिव
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Bureau News Desk
14 May 2026
08:19 PM
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अरविंद केजरीवाल की बड़ी फजीयत, जारी हुआ कोर्ट का आपराधिक अवमानना नोटिस
हाइलाइट्स
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की सख्त टिप्पणी - सोशल मीडिया के जरिए न्यायपालिका के खिलाफ चलाया गया समानांतर नैरेटिव

 

अरविन्द केजरीवालकी मुसीबतें काम हों का नाम नहीं ले रही है दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांटा शर्मा ने अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ अदालत की आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस मामले में मनीष सीसोदिया, संजय सिंह और दुर्गेश पाठक के खिलाफ भी अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की बात कही है।

 

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि ऐसे मामलों पर कार्रवाई नहीं की गई तो न्याय व्यवस्था में अराजकता फैल सकती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायपालिका जैसी संस्था के खिलाफ सार्वजनिक स्तर पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश गंभीर चिंता का विषय है।

 

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि जब अदालत के समक्ष रिक्यूज़ल यानी जज के मामले से अलग होने की मांग वाली याचिका आई थी, तब अदालत की समझ यह थी कि मामला केवल न्यायिक आदेश की वैधता और संभावित पक्षपात की आशंका तक सीमित है। लेकिन आदेश पारित होने के बाद अदालत को यह देखकर गंभीर झटका लगा कि सोशल मीडिया पर पत्र, वीडियो और रिकॉर्डिंग प्रसारित कर न्यायपालिका के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा था।

 

कोर्ट ने कहा कि मामला विचाराधीन होने के बावजूद अदालत के बाहर डिजिटल माध्यमों के जरिए जज और न्यायपालिका के खिलाफ समानांतर नैरेटिव तैयार किया गया। आदेश में कहा गया कि यह केवल एक न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणी नहीं थी, बल्कि पूरी न्यायिक संस्था को बदनाम करने का सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।

 

अदालत ने कहा कि प्रस्तावित अवमाननाकारियों के बयान और सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री यह दर्शाती है कि न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सार्वजनिक संदेह पैदा करने की कोशिश की गई। कोर्ट के अनुसार जज की कथित राजनीतिक विचारधारा और संबद्धता को लेकर आरोप लगाए गए ताकि लोगों के बीच न्यायपालिका को लेकर अलग धारणा बनाई जा सके।

 

कोर्ट ने यह भी कहा कि जज के परिवार के सदस्यों को भी जानबूझकर विवाद में घसीटा गया, जिससे उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित और बदनाम किया जा सके। अदालत के मुताबिक यह केवल निजी आलोचना का मामला नहीं बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत साख पर हमला है।

 

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी न्यायिक आदेश की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है और केवल आलोचना को अवमानना नहीं माना जा सकता। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आलोचना और संगठित दुष्प्रचार में अंतर होता है। अदालत के अनुसार इस मामले में आरोपियों ने केवल असहमति व्यक्त नहीं की, बल्कि जज की छवि खराब करने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की।

 

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अरविंद केजरीवाल ने अदालत को संबोधित अपना पत्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक किया था। अदालत के अनुसार कानूनी विवाद को न्यायालय के भीतर उठाने के बजाय सोशल मीडिया पर ले जाकर सार्वजनिक अभियान का रूप दिया गया।

 

आदेश में कहा गया कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के एक कॉलेज भाषण के वीडियो को संदर्भ से हटाकर इस तरह प्रसारित किया गया कि न्यायपालिका के खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाई जा सके। कोर्ट ने इसे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने और न्यायपालिका को प्रभावित करने का प्रयास बताया।

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